Wednesday, June 29, 2011

कबीर : कथाओं और चमत्कारों से परे का सच

Kabir: Truth Beyond Legends and Miracles
कबीर :  कथाओं और चमत्कारों से परे का सच

Satguru Kabir सत्गुरु कबीर

Kabir: Glittering Truth beyond the Legends
Many confusing things have been said in literature and on the Internet about Kabir. Such writings spread ignorance, hurt feelings of people having belief, faith and devotion in the religion of Kabir. It is said that Kabir was born to a Brahman widow (an immoral Brahman). It is natural for the Kabirdharmis to be in total disagreement with such of the articles because Kabir had a prudent personality and helped in overcoming the sickening elements of untouchability, caste, religion, bombast and Brahmanical culture in India. This article is elaboration of these points.
कबीर के बारे में बहुत भ्रामक बातें साहित्य में और इंटरनेट पर भर दी गई हैं. अज्ञान फैलाने वाले कई आलेख कबीरधर्म में आस्था, विश्वास और श्रद्धा रखने वालों के मन को ठेस पहुँचाते हैं. यह कहा जाता है कि कबीर किसी विधवा ब्राह्मणी (किसी चरित्रहीन ब्राह्मण) की संतान थे. ऐसे आलेखों से कबीरधर्म के अनुयायियों की सख्त असहमति स्वाभाविक है क्योंकि कबीर ऐसा विवेकी व्यक्तित्व है जो भारत को छुआछूत, जातिवाद, धर्मिक आडंबरों और ब्राह्मणवादी संस्कृति के घातक तत्त्वों से उबारने वाला है. यह आलेख इसी की व्याख्या है.
Kabir is Deep Rooted  
For centuries Kabir had been kept away from Hindi literature so that people should not know the reality of existence of a rich tradition of religion before Kabir that was different from the Hindu tradition and that the real Sanatan Dharma were Jain and Buddhist religions. There is humane approach of Buddhism in the core of Kabirdharm, Chritianity and Islam. It has been proven by modern research. It is prevalence of same religion that Kabir, despite  Islamic background, is deep rooted, like Buddha, in the hearts of aboriginals of India.
The aboriginals of India consider themselves descendants of Vritra who was defeated by a leather wearing ‘Aryan’ tribes and after centuries of war his warrior people  were pushed into poverty  and named 'snakes' and 'demons'. According to information available relating to Harappan Civilization they knew the art of making cloth. Further, those people were divided into different castes, tribes and other backward castes (SCs, STs and OBCs of present day) etc. in order to stall their unity. Kabir is from the same group of people. Kabir created an ideological revolution through religion so that the then scholars having monopoly over education were scared and they did everything to keep him away from literature.
Kabir belonged to a weaver family. Kabir himself wrote that "Says Kabir the Kori'. The Kori-Koli is a weaver community. It is clear that Kabir was born in the family who had suffered from untouchability-based poverty and slavery and had adopted Islam for getting out of the hell. That is why the descendants of Vritra or India’s Mulnivasis (aboriginals) are naturally associated with Kabir and many prefer to be called Kabirpanthy.
In India today ordinary Hindu has nothing against Kabir. Yes hardcore Brahmanical and others having tendencies like them get confused when they read Kabir’s literature.
कबीर की गहरी जड़ें
कबीर को सदियों हिंदी साहित्य से दूर रखा गया ताकि लोग यह वास्तविकता न जान लें कि कबीर के समय में और उससे पहले भी भारत में धर्म की एक समृद्ध परंपरा थी जो हिंदू परंपरा से अलग थी और कि भारत के सनातन धर्म वास्तव में जैन और बौध धर्म हैं. कबीरधर्म, ईसाईधर्म तथा इस्लामधर्म के मूल में बौधधर्म का मानवीय दृष्टिकोण रचा-बसा है. यह आधुनिक शोध से प्रमाणित हो चुका है. उसी धर्म की व्यापकता का ही प्रभाव है कि इस्लाम की पृष्ठभूमि के बावजूद कबीर भारत के मूलनिवासियों के हृदय में ठीक वैसे बस चुके हैं जैसे बुद्ध.


भारत के मूलनिवासी स्वयं को वृत्र का वंशज मानते हैं जिसे चमड़ा पहनने वाली आर्य नामक जनजाति ने युद्ध में पराजित किया और बाद में सदियों की लड़ाई के बाद जुझारू मूलनिवासियों को गरीबी में धकेल कर उन्हें नाग और असुर का नाम दिया. उपलब्ध जानकारी के अनुसार हडप्पा सभ्यता से संबंधित ये लोग कपड़ा बनाने की कला जानते थे. यही लोग आगे चल कर विभिन्न जातियों, जनजातियों, अन्य पिछड़ी जातियों (आज के SCs, STs, OBCs) आदि में बाँट दिए गए ताकि इनमें एकता स्थापित न हो. कबीर भी इसी समूह से हैं. इन्होंने ऐसी धर्म सिंचित वैचारिक क्रांति को जन्म दिया कि शिक्षा पर एकाधिकार रखने वाले तत्कालीन पंडितों ने भयभीत हो कर उन्हें साहित्य से दूर रखने में सारी शक्ति लगा दी. 
कबीर जुलाहा परिवार से हैं. कबीर ने स्वयं लिखा है कि कहत कबीर कोरी’. यह कोरी-कोली समाज कपड़ा बनाने का कार्य करता है. स्पष्ट है कि कबीर उस कोरी परिवार में जन्मे थे जो छुआछूत आधारित ग़रीबी और गुलामी से पीड़ित था और नरक से निकलने के लिए उसने इस्लाम अपनाया था. यही कारण है कि वृत्र के वंशज या भारत के मूलनिवासी स्वाभाविक ही कबीर के साथ जुड़े हैं और कई कबीरपंथी कहलाना पसंद करते हैं.
आज के भारत में देखें तो साधारण हिंदू को कबीर से कोई परहेज़ नहीं. हाँ कट्टर ब्राह्मणवादी और उनके जैसी प्रवृत्तियों के अन्य लोग कबीर का मूल साहित्य पढ़ कर उलझन में पड़ जाते हैं.
Splatters on Kabir's image
It is a fact that forefathers of Kabir had converted to Islam. So in terms of Kabir or his literature, wherever Hindu gods-goddesses or Hindu Pandits are referred to, has to be seen with suspicion. Recently I saw an animated film made on the life of Kabir, which had been linked to Vishnu-Lakshmi's story in a villainous way. There cannot be any match between Kabir (born and brought in Islam) and Vishnu-Lakshmi myth. It was purely an attempt to put dirty Brahminical color on humane hue of the Kabirdharma. This sort of act works as vulgar advertisement of Brahmanism and Manusmriti. Obviously it is a religious scam to suck up the economic resources of India's aboriginals. In order to prevent the progression of Kabirdharma all sort of exercises are done through covering Kabir's life with many mysteries in order to stop the flow of money to Dalit Gurus and their ministries.
In order to weaken Kabirdharma, nasty elements trigger debates on the subject as to whether Kabir was found at Laharatara pool or on the banks of the Ganges. Discussion is made on the date of his birthday. Controversies are raised about the master (guru) of Kabir. Ramanand, a Brahmin is projected as his master. There are so many versions of this story that it becomes easy to distrust them. Dishonest interpolations were made in Hindi literature to prove Ramanand as guru of not only Kabir but many more Saints from aboriginals of India. Many of them were not contemporaries of Ramanand. It is fact that Ramanand’s birth date is also unknown. Anybody can see it here on Sikhi Wiki. The efforts continue to underline the subject whether Kabir was born to a characterless widow Brahman lady (may be she herself suffered from Brhmanical practices) or highly religious parents named Noor Ali and Neema. There is no reason to believe such stories as they have been created by a sickening mindset. It is now beyond doubt that Kabir was son of Ali Noor-Neema and the rest of his birth stories are Brahmanical bickering only.
कबीर की छवि पर छींटे
यह तथ्य है कि कबीर के पुरखे इस्लाम अपना चुके थे. इसलिए कबीर के संदर्भ में या उनकी वाणी में जहाँ कहीं हिंदू देवी-देवताओं या हिंदू आचार्यों का उल्लेख आता है उसे संदेह की दृष्टि से देखना आवश्यक हो जाता है. पिछले दिनों कबीर के जीवन पर बनी एक एनिमेटिड फिल्म देखी जिसमें विष्णु-लक्ष्मी की कथा को शरारतपूर्ण तरीके से जोड़ा गया था. कहाँ इस्लाम में पढ़े-बढ़े कबीर और कहाँ विष्णु-लक्ष्मी. यह कबीरधर्म की मानवीय छवि पर गंदा पंडितवादी रंग डालने जैसा है. ऐसा करना ब्राह्मणवाद और मनुस्मृति के नंगे विज्ञापन का कार्य करता है. ज़ाहिर है इससे भारत के मूलनिवासियों के आर्थिक स्रोतों को धर्म के नाम पर सोखा जाता है. कबीर के जीवन को कई प्रकार के रहस्यों से ढँक कर यही कवायद की जाती है ताकि उसके अनुयायियों की संख्या को बढ़ने से रोका जाए और दलितों के धन को कबीर द्वारा प्रतिपादित कबीरधर्म, दलितों की गुरुगद्दियों-डेरों आदि ओर जाने से रोका जाए. इस प्रयोजन से कबीर के नाम से देश-विदेश में कई दुकानें खोली गई हैं.
कबीरधर्म को कमज़ोर करने के लिए स्वार्थी तत्त्व आज भी इस बात पर बहस कराते हैं कि कबीर लहरतारा तालाब के किनारे मिले या गंगा के तट पर. उनके जन्मदिन पर चर्चा कराई जाती है. कबीर के गुरु पर विवाद खड़े कर दिए जाते हैं. रामानंद नामी ब्राह्मण को उनके गुरु के रूप में खड़ा कर दिया गया. कबीर को ही नहीं अन्य कई मूलनिवासी जातियों के संतों को रामानंद का शिष्य सिद्ध करने के लिए साहित्य के साथ बेइमानी की गई. उनमें से कई तो रामानंद के समय में थे ही नहीं. तथ्य यह है कि रामानंद के अपने जन्मदिन पर भी विवाद है. इसके लिए सिखी विकि में यहाँ देखें. उस कथा के इतने वर्शन हैं कि उस पर अविश्वास करना सरल हो जाता है. वे किसी विधवा ब्राह्मणी की संतान थे या बहुत धार्मिक माता-पिता नूर अली और नीमा के ही घर पैदा हुए इस विषय को रेखांकित करने की कोशिश चलती रहती है. ऐसी कहानियों पर विश्वास करने का कोई कारण नहीं क्योंकि इन्हें कुत्सित मानसिकता ने बनाया है. इसमें अब संदेह नहीं रह गया है कि कबीर नूर अली-नीमा की ही संतान थे और उनके जन्म की शेष कहानियाँ ब्राह्मणवादी बक-बक है.
Kabir's mission - Nirvana
Nirvana word means to ‘blow away’. This word is technical term used in India’s most ancient (Sanatana, सनातन) Dharma i.e. 'Baudhdharma' (mostly and erroneously written as Buddhism). Broadly this means understanding the nature of mind and the process of creation of thoughts and then learn how illusionary (Maya) these imprints on mind are and stop giving them much importance. In other words, the source of worldly sorrows is 'imprints' (impressions and suggestions imprinted on mind) and freedom from them is called ‘Nirvana’. These imprints also include the theory of reincarnation based on another theory of Karma, a product of Brahmanism. The fact is that the aborigines of India were divided in various castes and also pushed to poverty and illiteracy. Such sins and misdeeds of Brahmanism were covered under a mock philosophy of Karma rebirth so that fingers are not raised towards them. The reality is that according to Santmat Nirvana means getting complete rid of the idea of ​​rebirth and philosophy of Karma.
This gives same meaning when Kabir's talks about getting out of the circle of rebirth or says, "O Sadhu! Doer is distinct from the deed (साधो कर्ता करम से न्यारा)". The most ancient Indian philosophy of Tattva Gnan (knowledge of matter including that of conscious element) says that everything is in this life and in this moment. Buddha and Kabir talk of 'now' and 'here' and not rebirths. From this angle Kabir is a wise man who has simply cut off micro net of Brahmanical culture. He is astute and prudent person, virtuous and full of virtues. We say ‘Jai Kabir’ because Kabir opened the way of liberation of aboriginals of India from Brahmanism.
कबीर का विशेष कार्य - निर्वाण
निर्वाण शब्द का अर्थ है फूँक मार कर उड़ा देना. भारत के सनातन धर्म अर्थात् बौधधर्म में इस शब्द का प्रयोग एक तकनीकी शब्द के तौर पर  हुआ है. मोटे तौर पर इसका अर्थ है मन के स्वरूप को समझ कर उसे छोड़ देना और मन पर पड़े संस्कारों और उनसे बनते विचारों को माया जान कर उन्हें महत्व न देना. दूसरे शब्दों में दुनियावी दुखों का मूल कारण संस्कार’ (impressions and suggestions imprinted on mind) है  जिससे मुक्ति का नाम निर्वाण है. इन संस्कारों में एक कर्म फिलॉसफी आधारित पुनर्जन्म का सिद्धांत भी है जो ब्राह्मणवाद की देन है. भारत के मूलनिवासियों को जातियों में बाँट कर गरीबी में धकेला गया और शिक्षा से भी दूर कर दिया गया. ब्राह्मणवाद द्वारा किए गए ऐसे पापों और कुकर्मों को एक नकली कर्म फिलॉसफी आधारित पुनर्जन्म के सिद्धांत से ढँक दिया गया ताकि उनकी ओर कोई उँगली न उठाए. वास्तविकता यह है कि संतमत के अनुसार निर्वाण का मतलब कर्म फिलॉसफी आधारित गरीबी और पुनर्जन्म के विचार से पूरी तरह छुटकारा है.


कबीर की आवागमन से निकलने की  बात करना और यह कहना कि साधो कर्ता करम से न्यारा इसी ओर संकेत करता है. भारत का सनातन तत्त्वज्ञान दर्शन (चेतन तत्त्व सहित अन्य तत्त्वों की जानकारी) कहता है कि जो भी है इस जन्म में है और इसी क्षण में है. बुद्ध और कबीर अब और यहीं की बात करते हैं. जन्मों की नहीं. इस दृष्टि से कबीर ऐसे ज्ञानवान पुरुष हैं जिन्होंने ब्राह्मणवादी संस्कारों के सूक्ष्म जाल को काट डाला है. वे चतुर ज्ञानी और विवेकी पुरुष हैं, सदाचारी हैं और सद्गुणों से पूर्ण हैं.....और जय कबीर इस भाव का सिंहनाद है कि कबीर ने भारत के मूलनिवासियों की ब्राह्मणवाद से मुक्ति का मार्ग खोला है.
What to do now
It is of no sequence where Kabir was born. It is better to set a date of his birth and close the argumentative mouths. (The day can be fixed on Navami somewhere in the months of October and November and stop consulting a priest astrologer). Those who see him as an icon for worship should see him in the form of someone beyond life and death. The word ‘Satguru’ (the one who imparts true knowledge) should be used with the name of Kabir or write only Kabir. Writing Kabir Das is as funny as writing Anwar Das. If Kabir is not presented properly in a scripture, book, movie, serial etc., then protest against it. Kabir is the center of our faith. Any attack on his image should be protested against with full force.
It's not necessary to know as to who was the guru of Kabir. Rather it is necessary to see the work of Kabir whom Pandits fear most. Focus on Kabir's wisdom and struggle. Concentrate on the instruments he cut the chains of social, religious and mental slavery with in order to free himself and the aboriginals of India and paved the way of their liberation.
There is another fact that teachings and inner practices of the Santmat established by Kabir completely match with that of Baudhdharma. Whatever Kabir did whole heartedly and intentionally is now available in the literature of Dr. Bhimrao Ambedkar. Dr. Ambedkar himself was from a Kabirdharmi family.
Here is a simple and brief biography of Kabir. It is miraculous but free from interesting and horrible tales telling miracles: -
Kabir's life
After the Buddha, Kabir is the greatest religious personality in India. He is originator of Santmat and adept of Surat Shabd Yoga. He is true Tattva Gnani. He recognizes the sole conscious elements and is grossly against rituals. He does not give importance to reincarnations, statues, Ramadan, Id, mosque, temple, etc. In India, any discussion on religion, language or culture is incomplete without a mention of Kabir.
He belonged to a Kori family (weavers) which had converted to Islam due to atrocities of Hindus. Kabir was born to Noor Ali and Neema near Lahartara in the year 1398 A.D. and was brought up and nurtured in highly religious environment.
During his youth he was married to Loi (more popularly known as mother Loi amongst followers of Kabir). She, in adherence of Islamic principles, spent whole of her life in the service of her husband. They had two children, Kamal (son) and Kamali (daughter). Kamali is one of the famous women saints of India. In technical terminology of Santmat the word ‘Naari’ (woman) is referred to ‘desire’ or ‘will’ and was used in the same meaning. But foolish Pandits, without understanding it, declared Kabir anti-women. Kabir is not anti-women, rather he stands with them. He does not even talk of renunciation (Tyag or Samnyasa). He was a Holy person who successfully lived in his household.
Kabir is a proven incarnation (not through rebirth) but a person whose knowledge had naturally assumed its shape in the social circumstances. He has fit things to say regardless of religion, creed and traditions. While he lived in Muslim society the caste-based discrimination continued to haunt their family therefore he openly opposed racist ignorance, fundamentalism and extremism prevalent in Hindu-Muslim society. Kabir is embodiment of spiritualism and a fighting socio-religious leader.
Kabir represents aboriginals of India. Kabir spoke the sweet truth on face of Brahmins and Pandits and their annoyance lead to interpolations in Kabir’s literature by them. They also changed the language of Kabir. It is difficult to say how much original literature of Kabir is available; however, lot of his original literature has been preserved and published by Kabirpanthi organizations. His books like Saakhi, Ramaini, Bijak, Bavan Akshari, Ulatbasi can be seen. In literature, Kabir's personality is unique. It can be seen from the available legends that Kabir remained in the company of devotees and mystics and kept their good points in his heart.
During his entire life, Kabir did the hard work of weaving to sustain his family. He never begged form anybody. Kabir lived up to the age of 119 years and died around 1518 A.D.
His ideology and philosophy is sufficiently reflected in these two verses: -
अब क्या हो?
कबीर कहीं भी पैदा हुए हों इससे कोई अंतर नहीं पड़ता. उनका प्रकाश दिवस (जन्मदिन) निर्धारित करना बेहतर होगा ताकि बहस करने वालों का मुँह बंद हो जाए. (यह दिन अक्तूबर-नवंबर में देशी माह की नवमी के दिन रखें. फिर किसी पंडित ज्योतिषी की न सुनें.) जो सज्जन कबीर को इष्ट के रूप में देखते हैं उन्हें चाहिए कि कबीर को जन्म-मरण से परे माने. कबीर के साथ सत्गुरु (सत्ज्ञान) शब्द का प्रयोग करें या केवल कबीर लिखें. कबीर दास लिखना उतना ही हास्यास्पद है जितना अनवर दास लिखना. यदि किसी धर्मग्रंथ, पुस्तक, फिल्म, सीरियल आदि में कबीर को समुचित तरीके से पेश नहीं किया जाता तो उसका विरोध करें. कबीर हमारी आस्था का केंद्र हैं. उस पर किसी भी आक्रमण का पूरी शक्ति से विरोध करें.
कबीर के गुरु कौन थे यह जानना कतई ज़रूरी नहीं है. आवश्यकता यह देखने की है कि कबीर ने ऐसा क्या किया जिससे पंडितवाद घबराता है. कबीर के ज्ञान पर ध्यान रखें उनके जीवन संघर्ष पर ध्यान केंद्रित करें. उन्होंने सामाजिक, धार्मिक तथा मानसिक ग़ुलामी की ज़जीरों को कैसे काटा और अपनी तथा अपने मूलनिवासी भारतीय समुदाय की एकता और स्वतंत्रता का मार्ग कैसे प्रशस्त किया, यह देखें. 

धर्म-चक्र और सत्ता का पहिया

एक तथ्य और है कि कबीर द्वारा चलाए संतमत की शिक्षाएँ और साधन पद्धतियाँ बौधधर्म से पूरी तरह मेल खाती हैं. कबीर ने अपनी नीयत से जो कार्य किया वह डॉ. भीमराव अंबेडकर के साहित्य में शुद्ध रूप से उपलब्ध है. डॉ अंबेडकर स्वयं कबीरपंथी (धर्मी) परिवार से थे.
चमत्कारों, रोचक और भयानक कथाओं से परे कबीर का सादा-सा चमत्कारिक जीवन इस प्रकार है:-



कबीर का जीवन
बुद्ध के बाद कबीर भारत के महानतम धार्मिक व्यक्तित्व हैं. वे संतमत के प्रवर्तक और सुरत-शब्द योग के प्रवर्तक और सिद्ध हैं. वे तत्त्वज्ञानी हैं. एक ही चेतन तत्त्व को मानते हैं और कर्मकाण्ड के घोर विरोधी हैं. अवतार, मूर्त्ति, रोज़ा, ईद, मस्जिद, मंदिर आदि को वे महत्व नहीं देते हैं. भारत में धर्म, भाषा या संस्कृति किसी की भी चर्चा कबीर की चर्चा के बिना अधूरी होती है.
उनका परिवार कोरी जाति से था जो हिंदुओं की जातिप्रथा के कारण हुए अत्याचारों से तंग आकर मुस्लिम बना था. कबीर का जन्म नूर अली और नीमा नामक दंपति के यहाँ लहरतारा के पास सन् 1398 में हुआ और बहुत अच्छे धार्मिक वातावरण में उनका पालन-पोषण हुआ.
युवावस्था में उनका विवाह लोई (जिसे कबीर के अनुयायी माता लोई कहते हैं) से हुआ जिसने सारा जीवन इस्लाम के उसूलों के अनुसार पति की सेवा में व्यतीत कर दिया. उनकी दो संताने कमाल (पुत्र) और कमाली (पुत्री) हुईं. कमाली की गणना भारतीय महिला संतों में होती है. संतमत की तकनीकी शब्दावली में उन दिनों नारी से तात्पर्य कामना या इच्छा से रहा है और इसी अर्थ में प्रयोग होता रहा है. लेकिन मूर्ख पंडितों ने कबीर को नारी विरोधी घोषित कर दिया. कबीर हर प्रकार से नारी जाति के साथ चलने वाले सिद्ध होते हैं. उन्होंने संन्यास लेने तक की बात कहीं नहीं की. वे अपने गृहस्थ में सफलतापूर्वक रहने वाले सत्पुरुष थे.
कबीर स्वयंसिद्ध अवतारी पुरूष थे जिनका ज्ञान समाज की परिस्थितियों में सहज ही स्वरूप ग्रहण कर गया. वे किसी भी धर्म, सम्प्रदाय और रूढ़ियों की परवाह किये बिना खरी बात कहते हैं. मुस्लिम समाज में रहते हुए भी जातिगत भेदभाव ने उनका पीछा नहीं छोड़ा इसी लिए उन्होंने हिंदू-मुसलमान सभी में व्याप्त जातिवाद के अज्ञान, रूढ़िवाद तथा कट्टरपंथ का खुलकर विरोध किया. कबीर आध्यात्मिकता से भरे हैं और जुझारू सामाजिक-धार्मिक नेता हैं.
कबीर भारत के मूनिवासियों का प्रतिनिधित्व करते हैं. ब्राह्मणवादियों और पंडितों के विरुद्ध कबीर ने खरी-खरी कही जिससे चिढ़ कर उन्होंने कबीर की वाणी में बहुत सी प्रक्षिप्त बातें ठूँस दी हैं और कबीर की भाषा के साथ भी बहुत खिलवाड़ किया है. आज निर्णय करना कठिन है कि कबीर की शुद्ध वाणी कितनी बची है तथापि उनकी बहुत सी मूल वाणी को विभिन्न कबीरपंथी संगठनों ने प्रकाशित किया है और बचाया है. कबीर की साखी, रमैनी, बीजक, बावन-अक्षरी, उलटबासी देखी जा सकती है. साहित्य में कबीर का व्यक्तित्व अनुपम है. जनश्रुतियों से ज्ञात होता है कि कबीर ने भक्तों-फकीरों का सत्संग किया और उनकी अच्छी बातों को हृदयंगम किया.
कबीर ने सारी आयु कपड़ा बनाने का कड़ा परिश्रम करके परिवार को पाला. कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया. सन् 1518 के आसपास कबीर ने 119 वर्ष की आयु में देह त्याग किया.
उनके ये दो शब्द उनकी विचारधारा और दर्शन को पर्याप्त रूप से इंगित करते हैं:-
(1)
आवे न जावे मरे नहीं जनमे, सोई निज पीव हमारा हो
न प्रथम जननी ने जनमो, न कोई सिरजनहारा हो
साध न सिद्ध मुनी न तपसी, न कोई करत आचारा हो
न खट दर्शन चार बरन में, न आश्रम व्यवहारा हो
न त्रिदेवा सोहं शक्ति, निराकार से पारा हो
शब्द अतीत अटल अविनाशी, क्षर अक्षर से न्यारा हो
ज्योति स्वरूप निरंजन नाहीं, ना ओम् हुंकारा हो
धरनी न गगन पवन न पानी, न रवि चंदा तारा हो
है प्रगट पर दीसत नाहीं, सत्गुरु सैन सहारा हो
कहे कबीर सर्ब ही साहब, परखो परखनहारा हो
(2)
मोको कहाँ ढूँढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में
न तीरथ में, न मूरत में, एकांत निवास में
न मंदिर में, न मस्जिद में, न काशी कैलाश में
न मैं जप में, न मैं तप में, न मैं बरत उपास में
न मैं किरिया करम में रहता, नहीं योग संन्यास में
खोजी होए तुरत मिल जाऊँ, एक पल की तलाश में
कहे कबीर सुनो भई साधो, मैं तो हूँ विश्वास में

courtesy : https://sites.google.com/site/kabirtruthbeyondlegends/

2 comments:

Bhushan said...

Thanks for bringing my article here.

Pravin Gokuldeo Bhaiswar said...

Dear one, I am also Kabir panthi, but I could not get the true information about Sadguru Kabirji. Because, all have opened business by the name of Kabir sahab and they change HIS main literature. so please provide me or guide me where i can find HIS true literature or information. My mail id is bhaiswarpravin@gmail.com and mobile is 9923041396

Saheb Bandagi!

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